महाराणा प्रताप की प्रतिज्ञा: मेवाड़ के गौरव की अनमोल कहानी
यह कहानी है महाराणा प्रताप की प्रतिज्ञा की, जिन्होंने मेवाड़ के गौरव को कायम रखने के लिए बहुत कठिन व्रत लिया था। जब महाराणा प्रताप मेवाड़ के राजा बने, तब राज्य की हालत बहुत ख़राब थी। मेवाड़ के सबसे महत्वपूर्ण किले, चित्तौड़ पर, मुगलों का कब्ज़ा हो गया, और इसके चारों ओर निराशा का माहौल व्याप्त हो गया।। राजपूतों का साहस कमजोर हो गया था और कई राजपूत राजा मुगल सम्राट अकबर के दरबार में आये और उनकी दासता स्वीकार कर चुके थे। इसी कारण से महाराणा प्रताप अकेले पड़ गए थे।
जब महाराणा प्रताप ने राज्य का भार संभाला, तो उनके पास न तो धन था और न ही सेना। लेकिन उनका इरादा पक्का था। प्रताप को अपने देश की मिट्टी से बहुत लगाव था। बचपन में वे अक्सर अपने पूर्वजों की वीरतापूर्ण कहानियाँ सुनते थे और उनके दिल में चित्तौड़ को पुनः स्वतंत्र कराने का सपना था।
प्रताप जानते थे कि चित्तौड़ को आज़ाद कराना आसान नहीं होगा, क्योंकि अकबर बहुत शक्तिशाली था। अकबर की नीतियों के कारण कई राजपूत राजा उसकी ओर हो गए थे, जैसे जयपुर के राजा मानसिंह, जो अकबर के सेनापति बने। यहाँ तक कि प्रताप के कुछ भाई भी अकबर से जा मिले थे। इससे प्रताप को बहुत दुःख हुआ, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी।
प्रताप ने मन ही मन एक विशेष प्रतिज्ञा की। उन्होंने निर्णय लिया कि जब तक चित्तौड़ को मुगलों से मुक्त नहीं करा लेंगे, तब तक वे न तो मुलायम बिस्तर पर सोएंगे, न सोने या चांदी के बर्तनों में भोजन करेंगे, और न ही अपने बाल कटवाएंगे। इस शपथ के कारण प्रताप ने अपने महल के सभी सोने-चांदी के बर्तन तोड़ दिए और पूरे राजपरिवार ने घास के बिस्तर पर सोना शुरू कर दिया।

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उन्होंने सेना में विशेष नियम भी बनाये। पहले मेवाड़ की सेना सबसे आगे नगाड़े बजाती थी, लेकिन अब प्रताप ने सभी को यह याद दिलाने के लिए कि मेवाड़ का गौरव बहाल करना पूरी सेना की जिम्मेदारी है, सेना के पीछे नगाड़े बजाने का आदेश दिया।
महाराणा प्रताप इतने दृढ़ निश्चयी थे कि उन्होंने अपनी प्रजा को महल छोड़कर पहाड़ों में बसने के लिए भी कहा। उन्होंने यह भी कहा कि राज्य में कोई त्योहार नहीं मनाया जाएगा और कोई खेती या व्यापार नहीं होगा ताकि दुश्मनों को आकर्षित करने के लिए कोई संसाधन न बचे।
प्रताप की इस प्रतिज्ञा में पूरा मेवाड़ उनके साथ खड़ा हुआ। हर छोटे-बड़े व्यक्ति ने उनके साथ मिलकर यह कठिन समय बिताने का संकल्प लिया। बड़ी-बड़ी रियासतों के राजा हो या साधारण प्रजा, सभी ने प्रताप की इस कठिन प्रतिज्ञा में उनका साथ दिया और राज्य के उद्धार के लिए एकजुट हो गए।
महाराणा प्रताप ने अपने देश के लिए अपना सब कुछ बलिदान कर दिया। उनका प्रेम एक सच्चे योगी की तरह था। जैसे एक योगी अपने ईश्वर की भक्ति में सब कुछ छोड़ देता है, वैसे ही प्रताप ने अपने देश-प्रेम में सब सुख-चैन छोड़ दिए।
उनकी इस महान प्रतिज्ञा ने मेवाड़ के लोगों में एक नया उत्साह पैदा किया।
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