महर्षि विश्वामित्र संग राम और लक्ष्मण की साहसिक यात्रा का प्रारंभ
अयोध्या की गलियों में चारों राजकुमार अपनी चंचल मुस्कान और तेजस्वी रूप से सबका मन मोह लेते थे। जब भी वे खेलते-कूदते बाहर आते, राह चलते लोग रुक जाते और अपलक उन्हें निहारते। राम सबसे बड़े थे, शांत और गम्भीर स्वभाव के। लक्ष्मण अक्सर उनके साथ रहते और हर बात में उनका साथ निभाते। भरत और शत्रुघ्न की जोड़ी भी उतनी ही स्नेहिल थी।
समय बीतता गया, और राजकुमार शिक्षा की ओर अग्रसर हुए। गुरुकुल में उन्होंने वेद-शास्त्र से लेकर धनुष-बाण की विद्या तक, हर ज्ञान गहराई से सीखा। सभी तेजस्वी थे, लेकिन राम अपनी बुद्धिमत्ता और संयम के कारण विशेष रूप से प्रिय थे।
युवा होने पर उनके विवाह की चर्चा महल और नगर में होने लगी। महाराज दशरथ भी अपने पुत्रों के लिए योग्य वधुओं की तलाश में थे। तभी एक दिन राजमहल के वातावरण में हलचल हुई — महर्षि विश्वामित्र पधार रहे थे।
दशरथ तुरंत उठ खड़े हुए और महर्षि का स्वागत करते हुए उन्हें दरबार में ले आए। विश्वामित्र का व्यक्तित्व प्रभावशाली था — वे कभी एक वीर राजा थे, पर राजपाट त्यागकर तपस्वी बन गए थे। उनका आश्रम “सिद्धाश्रम” तप और साधना का केंद्र था।
दशरथ तुरंत उठ खड़े हुए और महर्षि का स्वागत करते हुए उन्हें दरबार में ले आए। विश्वामित्र का व्यक्तित्व प्रभावशाली था — वे कभी एक वीर राजा थे, पर राजपाट त्यागकर तपस्वी बन गए थे। उनका आश्रम “सिद्धाश्रम” तप और साधना का केंद्र था।
दशरथ ने आदरपूर्वक पूछा, “महर्षि, आज्ञा दें, मैं आपकी सेवा कैसे कर सकता हूँ?”
विश्वामित्र ने गंभीर स्वर में कहा, “राजन, मेरा अनुरोध कठिन है। मेरे यज्ञ में दो राक्षस विघ्न डाल रहे हैं, और उन्हें रोकने में केवल आपका ज्येष्ठ पुत्र राम सक्षम है। मैं चाहता हूँ कि आप उसे मेरे साथ भेज दें।”
दशरथ यह सुनकर अचंभित रह गए। वे सोच भी नहीं सकते थे कि महर्षि उनके सबसे प्रिय पुत्र को माँगेंगे। उनका हृदय उदासी से भर गया। उन्होंने संकोच से कहा, “महामुनि, राम अभी युवा भी नहीं हुए हैं। मायावी राक्षसों से वह कैसे सामना करेगा? इसके बजाय मैं अपनी सेना या स्वयं आपके साथ चल सकता हूँ।”
विश्वामित्र ने कुछ पल मौन रहकर कहा, “राजन, आप रघुवंश के उत्तराधिकारी हैं और वचन की महत्ता जानते हैं। यदि आप अपना वादा तोड़ते हैं, तो यह कुल की प्रतिष्ठा के विपरीत होगा। यदि आप राम को नहीं देंगे, तो मुझे खाली हाथ लौटना होगा।”
दरबार में सन्नाटा छा गया। तभी गुरु वशिष्ठ आगे आए और बोले, “राजन, महर्षि विश्वामित्र कोई साधारण व्यक्ति नहीं हैं। वे तप और ज्ञान के भंडार हैं। उनके साथ रहकर राम अनेक अद्भुत विद्याएँ सीखेंगे और उनका अनुभव उन्हें और भी प्रबल बनाएगा। महर्षि के सान्निध्य में उन्हें कोई हानि नहीं पहुँचेगी।”
दशरथ का मन भारी था, लेकिन गुरु की बातों ने उन्हें निर्णय लेने की शक्ति दी। उन्होंने कहा कि यदि राम जाएँगे, तो उनके साथ लक्ष्मण भी रहेंगे। विश्वामित्र ने इस शर्त को स्वीकार कर लिया।
राम और लक्ष्मण को दरबार में बुलाया गया। दशरथ ने प्रेम और गर्व के मिश्रित भाव से उन्हें आदेश सुनाया। दोनों ने सिर झुकाकर आदरपूर्वक स्वीकृति दी। जब माता कौशल्या को यह सूचना मिली, तो उनके हृदय में भी चिंता और गर्व साथ-साथ उमड़े।
अगले दिन, शुभ मंत्रोच्चार, शंखध्वनि और नगाड़ों की गूँज के बीच दोनों राजकुमार प्रस्थान के लिए तैयार हुए। दशरथ ने भावुक होकर उनके सिर पर हाथ रखा और मस्तक चूमा। महर्षि विश्वामित्र आगे-आगे, उनके पीछे दृढ़ कदमों से राम, और फिर लक्ष्मण — धनुष-बाण से सुसज्जित — अज्ञात जंगलों की ओर चल पड़े। यह यात्रा केवल एक यज्ञ की रक्षा के लिए नहीं थी, बल्कि उनके जीवन की दिशा बदल देने वाला साहसिक अध्याय बनने जा रही थी।

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