ताड़का वध

अयोध्या से निकलते समय सूरज ऊँचाई पर था। महर्षि विश्वामित्र आगे-आगे चल रहे थे, और उनके पीछे राम और लक्ष्मण। रास्ता सरयू नदी के किनारे-किनारे था। महल और शहर की बस्तियाँ धीरे-धीरे पीछे छूटती गईं। जैसे-जैसे वे आगे बढ़े, पीछे की दुनिया ओझल होती गई।

राम और लक्ष्मण ने एक बार भी पीछे नहीं देखा। उनकी नज़र गुरु के सधे कदमों पर थी। दिन ढलने को आया, पर दोनों के चेहरे पर थकान नहीं थी — बस उत्सुकता थी।

संध्या होते-होते महर्षि रुके। आसमान में लौटते पक्षियों के झुंड उड़ रहे थे। चरवाहे गायों को लेकर घर लौट रहे थे।
“आज रात हम यहीं रुकेंगे,” महर्षि ने मुस्कुराकर कहा, “और मैं तुम्हें एक खास विद्या सिखाऊँगा।”

राम और लक्ष्मण ने नदी में मुँह-हाथ धोया, फिर महर्षि के पास आकर बैठे। महर्षि ने उन्हें ‘बला’ और ‘अतिबला’ नाम की दो अद्भुत विद्या दी, जो उन्हें हर समय सुरक्षित रखेगी। पत्तों और तिनकों का बिछौना बनाकर तीनों ने रात यहीं बिताई।

अगली सुबह वे गंगा और सरयू के संगम पर पहुँचे। यहाँ से नाव लेकर गंगा पार की, और फिर घने जंगल में प्रवेश किया। पेड़ों की शाखाएँ इतनी घनी थीं कि सूरज की किरणें भी मुश्किल से नीचे पहुँच रही थीं। हर ओर अनजानी आवाजें थीं — कहीं झींगुर, कहीं जंगली जानवर।

महर्षि ने कहा, “इनसे डरने की जरूरत नहीं। खतरा असली है ताड़का से। यह राक्षसी इस वन को वीरान कर चुकी है। जो भी यहाँ आता है, वह उसका शिकार बनता है। ताड़का का एक बेटा भी है — मारीच। यह भी राक्षसों में बलशाली और मायावी है, और अक्सर अपनी माँ के साथ मिलकर उत्पात मचाता है। आज तुम्हें ताड़का का आतंक समाप्त करना होगा।”

ताड़का वध – बच्चों के लिए कहानी

 राम ने बिना देर किए धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाई और जोर से खींचकर छोड़ा। ताड़का ने यह आवाज सुनी तो गरजते हुए दौड़ पड़ी। उसके आने से जंगल जैसे काँप उठा। पेड़ हिलने लगे, पत्ते उड़ने लगे, धूल का गुबार छा गया।

ताड़का ने पत्थरों की बौछार कर दी। राम और लक्ष्मण ने जवाब में बाण चलाए। एक-एक करके बाण ताड़का को घेरने लगे। आखिरकार राम का एक तीर उसके हृदय में लगा। वह ज़मीन पर गिरी और फिर उठ न पाई।

ताड़का वध

 

महर्षि ने प्रसन्न होकर राम को गले लगाया और दोनों भाइयों को अनेक दिव्य अस्त्र-शस्त्र दिए। उनके प्रयोग की विधि भी बताई।

रात होने पर वे वहीं रुके। अब जंगल शांत था — पत्तों से गुजरती हवा की सरसराहट और चिड़ियों की मधुर चहचहाहट सुनाई दे रही थी। सुबह वे महर्षि के आश्रम की ओर बढ़े और शीघ्र ही वहाँ पहुँच गए। आश्रमवासियों ने हर्षपूर्वक स्वागत किया।

यज्ञ की तैयारियाँ शुरू हुईं। महर्षि ने उसकी रक्षा का दायित्व राम और लक्ष्मण को सौंपा। पाँच दिन तक सब ठीक चला। दोनों भाइयों ने न सोने का प्रण लिया, ताकि कोई विघ्न न डाल सके।

अंतिम दिन भयंकर शोर के साथ सुबाहु और मारीच अपनी सेना लेकर आ पहुँचे। मारीच, अपनी माँ ताड़का की मृत्यु से क्रोधित था और प्रतिशोध लेना चाहता था। राम ने तुरंत बाण चलाया। मारीच दूर समुद्र किनारे जा गिरा और फिर भाग खड़ा हुआ। राम का दूसरा बाण सुबाहु को लगा, और उसका अंत हो गया। लक्ष्मण ने बाकी राक्षसों पर तीर चलाकर उन्हें तितर-बितर कर दिया। 

यज्ञ बिना रुकावट के पूरा हुआ। महर्षि संतुष्ट थे, और राम-लक्ष्मण की वीरता की चर्चा दूर-दूर तक फैल गई।
यज्ञ संपन्न होने के बाद राम ने आदरपूर्वक महर्षि के चरण स्पर्श किए और विनम्र स्वर में पूछा,
“अब हमारे लिए क्या आज्ञा है, मुनिवर?”

महर्षि विश्वामित्र ने स्नेहपूर्वक राम को गले लगाया और मुस्कुराते हुए बोले,
“अब हम मिथिला चलेंगे — महाराज जनक के दरबार में। मैं चाहता हूँ कि तुम दोनों मेरे साथ वहाँ चलो और उनके भव्य आयोजन में हिस्सा लो। वहाँ तुम्हें एक अनुपम शिव-धनुष देखने का अवसर मिलेगा, जो स्वयं में अद्वितीय और अद्भुत है।”

सुबाहु और मारीच
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