राम और सीता विवाह की कहानी

राम और सीता विवाह की कहानी

आश्रम से निकलने के बाद राम और लक्ष्मण उत्साह से भरे थे। नई जगह देखने और नए अनुभव लेने का अवसर उन्हें मिल रहा था। महर्षि विश्वामित्र, अपने शिष्यों और दोनों राजकुमारों के साथ, लंबी यात्रा करते हुए सोन नदी पार कर मिथिला की सीमा में पहुँचे। रास्ते में वे गौतम ऋषि के आश्रम से होकर गुज़रे और अंततः जनकपुर नगर में कदम रखा।

महाराज जनक स्वयं महल से बाहर आए और महर्षि का गर्मजोशी से स्वागत किया। जब उनकी नज़र राम और लक्ष्मण पर पड़ी, तो वे कुछ पल के लिए ठिठक गए। विस्मय से उन्होंने महर्षि से पूछा—
“मुनिवर! ये तेजस्वी और सुंदर राजकुमार कौन हैं? इनकी आभा मुझे अपनी ओर खींच रही है।”
महर्षि मुस्कुराए— “महाराज, ये अयोध्या नरेश दशरथ के पुत्र, राम और लक्ष्मण हैं। मैं इन्हें आपके अद्भुत शिव-धनुष का दर्शन कराने लाया हूँ।”

राजा जनक ने उनके ठहरने का प्रबंध एक सुंदर उद्यान में करवाया। अगले दिन, यज्ञशाला में बड़े-बड़े ऋषि-मुनि और आमंत्रित जन एकत्र हुए। तभी राजा ने अपने सेवकों को आदेश दिया कि शिव-धनुष को लाया जाए।

कुछ ही देर में, लोहे की भारी पेटी में रखा धनुष, आठ बड़े पहियों पर लुढ़कता हुआ यज्ञशाला में पहुँचा। उसका आकार इतना विशाल था कि उसे उठाना लगभग असंभव लगता था। राजा जनक की आँखों में हल्की उदासी उभर आई—
“मुनिवर, मैंने प्रण किया है कि जो इस धनुष को उठाकर उस पर प्रत्यंचा चढ़ा देगा, उसी से मेरी पुत्री सीता का विवाह होगा। अनेक वीर प्रयास कर चुके, पर कोई इसे हिला भी नहीं सका।”

महर्षि ने राम की ओर देखा— “वत्स, जाकर इस धनुष को देखो।”
राम ने सिर झुकाकर गुरु की आज्ञा मानी। उन्होंने पेटी का ढक्कन खोला, धनुष को गौर से देखा, और सहजता से दोनों हाथों में उठा लिया। सभा में बैठे लोग आश्चर्य से सांसें थामकर देख रहे थे।
राम ने पूछा— “क्या मैं इस पर प्रत्यंचा चढ़ा सकता हूँ, मुनिवर?”
महर्षि ने अनुमति दी।

राम ने सहज भाव से धनुष झुकाया, प्रत्यंचा खींची— और तभी एक जोरदार ध्वनि के साथ वह बीच से टूट गया। सभा में सन्नाटा छा गया। फिर राजा जनक के चेहरे पर प्रसन्नता छा गई— उन्हें अपनी पुत्री के लिए योग्य वर मिल चुका था।

उन्होंने तुरंत महर्षि से आग्रह किया— “यदि आप अनुमति दें तो मैं महाराज दशरथ को संदेश भेजूँ, ताकि वे बारात लेकर पधारें।”
महर्षि ने सहमति दी और तेज रथों पर दूत अयोध्या रवाना कर दिए गए।

अयोध्या में यह समाचार सुनते ही हर्ष की लहर दौड़ गई। शीघ्र ही बारात तैयार हुई— हाथी, घोड़े, रथ और गाजे-बाजे के साथ यात्रा शुरू हुई। पाँच दिन बाद बारात जनकपुरी पहुँची, जो उस समय फूलों की चादर से सजी थी। गलियों में तोरणद्वार, हर घर से मंगलगीत, और मार्गों पर अपार भीड़ राम और सीता की एक झलक पाने को बेताब थी।

विवाह से पूर्व राजा जनक ने राजा दशरथ से आग्रह किया— “राजन! मेरी दूसरी पुत्री उर्मिला का विवाह लक्ष्मण से हो, और मेरे भाई कुशध्वज की पुत्रियाँ मांडवी व श्रुतकीर्ति, भरत और शत्रुघ्न को परिणय सूत्र में बाँधें।”
दशरथ ने प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार किया।

शुभ घड़ी में सीता-राम, उर्मिला-लक्ष्मण, मांडवी-भरत और श्रुतकीर्ति-शत्रुघ्न का विवाह संपन्न हुआ। कुछ दिन बाद, आनंद और उत्सव के बीच, बारात अयोध्या लौटी। नगर में आरतियों, फूलों की वर्षा और शंखध्वनि से वातावरण गूंज उठा। यह उल्लास कई दिनों तक चलता रहा, और अयोध्या फिर से खुशियों से भर गई।

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