श्रीराम जन्म कथा
बहुत-बहुत समय पहले, सरयू नदी के किनारे एक बेहद सुंदर और खुशहाल शहर था — अयोध्या। इसे देखकर लगता था मानो स्वर्ग धरती पर उतर आया हो। शहर की हवेलियाँ, महल, छोटे-छोटे घर सब इतने साफ-सुथरे और भव्य थे कि देखने वाले बस देखते ही रह जाएँ। चौड़ी-चौड़ी सड़कें, जिनके दोनों ओर हरे-भरे बाग-बगीचे थे। तालाब पानी से भरे चमचमा रहे थे, और खेतों में फसलें हवा के साथ लहराती थीं। अयोध्या में हर कोई सुखी था, कोई गरीब या दुखी नहीं था।

अयोध्या कोसल राज्य की राजधानी थी और यहाँ राज करते थे राजा दशरथ। वे न सिर्फ वीर योद्धा थे, बल्कि न्यायप्रिय और दयालु भी थे। राजा दशरथ महाराज अज के पुत्र और महान महाराज रघु के वंशज थे — यानी वे रघुकुल के उत्तराधिकारी थे। रघुकुल की परंपरा थी कि “रघुकुल रीति सदा चली आई, प्राण जाए पर वचन न जाई” — यानी चाहे जान चली जाए, लेकिन दिया हुआ वचन कभी नहीं तोड़ा जाता।
राजा दशरथ के पास हर सुख था — सुंदर महल, सुखी प्रजा, वफादार मंत्री और वीर सेनापति। लेकिन एक बात उन्हें और उनकी तीनों रानियों — कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी — को हमेशा दुखी कर देती थी। उनके कोई संतान नहीं थी। बिना उत्तराधिकारी के राज्य का भविष्य उन्हें चिंतित करता था। यही चिंता श्रीराम जन्म कथा की शुरुआत का कारण बनी।
एक दिन राजा दशरथ ने अपने राजगुरु मुनि वशिष्ठ को बुलाकर अपनी चिंता बताई,
राजा दशरथ: “गुरुदेव, मेरे पास सब कुछ है, पर संतान का सुख नहीं। मैं अपने रघुकुल का उत्तराधिकारी देखना चाहता हूँ।”
मुनि वशिष्ठ: “महाराज, चिंता न करें। आप पुत्रेष्टि यज्ञ करें। महान ऋषि ऋष्यश्रृंग इस यज्ञ का संचालन करेंगे। आपकी मनोकामना अवश्य पूरी होगी।”
राजा ने तुरंत यज्ञ की तैयारी का आदेश दिया। सरयू नदी के किनारे एक भव्य यज्ञशाला बनाई गई। दूर-दूर से राजा, मंत्री, ऋषि और नगरवासी आमंत्रित किए गए। यज्ञ के दिन वातावरण मंत्रोच्चार और शंखध्वनि से गूंज उठा। एक-एक कर सभी ने आहुति डाली। अंत में राजा दशरथ ने आहुति दी।
अग्निदेव प्रकट हुए और राजा को आशीर्वाद दिया। राजा दशरथ ने गुरु की आज्ञा अनुसार आगे की विधि पूरी की। समय बीता और शुभ समाचार मिला — तीनों रानियाँ गर्भवती हुईं।
कुछ महीनों बाद, चैत्र मास की नवमी को रानी कौशल्या ने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया — जिसका नाम रखा गया राम। रानी सुमित्रा के दो पुत्र हुए — लक्ष्मण और शत्रुघ्न। रानी कैकेयी ने भी एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया — भरत। यही चारों राजकुमार आगे चलकर श्रीराम जन्म कथा के मुख्य नायक बने।

राजमहल में खुशियों की लहर दौड़ गई। अयोध्या की गलियों में ढोल-नगाड़े बजने लगे, लोग नाचने-गाने लगे, मिठाइयाँ बाँटी गईं। राजा दशरथ ने एक भव्य उत्सव आयोजित किया। दूर-दूर से आए मेहमानों का सम्मान हुआ और उन्हें कपड़े, अनाज और धन देकर विदा किया गया।
अयोध्या की प्रजा फूले नहीं समा रही थी। अब उनके पास चार प्यारे राजकुमार थे — राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न। सभी यह जानते थे कि रघुकुल की परंपरा और अयोध्या की मर्यादा अब सुरक्षित हाथों में है।
और इस तरह, अयोध्या की धरती पर श्रीराम जन्म कथा पूरी हुई — जो आगे चलकर पूरी दुनिया के लिए मर्यादा, सत्य और धर्म का प्रतीक बनी।
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